अक्षय नवमी के दिन किया जाता है आंवले के पेड़ के नीचे भोजन, जानें इसका कारण

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शास्त्रों में अक्षय नवमी का बहुत महत्व माना जाता है, अक्षय नवमी को आंवला नवमी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस दिन किए गए दान-पूण्य का अक्षय फल प्राप्त होता है। लेकिन यदि इस दिन कुछ अनैतिक व शास्त्र के विरुद्ध काम किया जाए तो इसके विपरित परिणाम भी देखने को मिल सकते हैं और ना सिर्प इश जन्म में बल्कि अगले जन्म तक भुगतने पड़ सकते हैं। इसलिए इस दिन शास्त्र के विरुद्ध काम ना करें, वरना आपको इसका कष्ट भोगना पड़ सकता है। इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा करने का विधान माना गया है। क्योंकि आंवले के वृक्ष में क्षी विष्णु और शिव जी का वास होता है।

इसलिए अक्षय नवमी के दिन किया जाता है आंवले के पेड़ के नीचे भोजन, जानें इसका कारण

आंवला नवमी का महत्व

अक्षय नवमी के दिन प्रातः उठकर धातृ के वृक्ष के नीचे साफ-सफाई करनी चाहिए। आंवले के वृक्ष की पूजा दूध, फूल एवं धूप से करनी चाहिए। इस दिन आंवला खाना भी बहुत शुभ माना जाता है। क्योंकि चरक संहिता के अनुसार अक्षय नवमी को आंवला खाने से महर्षि च्यवन को फिर से जवानी यानी नवयौवन प्राप्त हुआ था। इसलिए अक्षय नवमी के दिन अगर आंवले की पूजा करना और आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन बनाना और खाना संभव नहीं हो तो इस दिन आंवला जरूर खाना चाहिए।

दूसरी मान्यता के अनुसार आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन करने का भी विधान माना जाता है। इसके पीछे एक अलग मान्यता है, आंवले के पेड़ के नीचे भोजन करने की प्रथा माता लक्ष्मी द्वारा शुरु की गई थी। इस बारे में एक कथा भी प्रचलित हैं जिसके अनुसार एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी भ्रमण करने आयीं। रास्ते में भगवान विष्णु एवं शिव की पूजा एक साथ करने की इच्छा हुई। लक्ष्मी मां ने विचार किया कि एक साथ विष्णु एवं शिव की पूजा कैसे हो सकती है। तभी उन्हें ख्याल आया कि तुलसी एवं बेल का गुण एक साथ आंवले में पाया जाता है। उसके बाद माता लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की। पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव प्रकट हुए। लक्ष्मी माता ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु और भगवान शिव को भोजन करवाया। इसके बाद स्वयं भोजन किया। उस दिन के बाद से यह प्रथा चली आ रही है और आज भी नीभाई जा रही है।