कुंभ में स्नान के बाद जरूर करें इस वृक्ष के दर्शन, अन्यथा नहीं मिलेगा पुण्य

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शाही स्नान कर पुण्य पाने के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं सिर्फ स्नान से आपको पूरा फल प्राप्त नहीं होता है। जी हां, मान्यताओं के अनुसार स्नान के बाद वृक्ष के दर्शन करने से पूर्ण फल प्राप्त होता है। पौराणिक कथाओं के अऩुसार माना जाता है की प्रयाग में स्नान के बाद जब तक अक्षय वट वृक्ष का पूजन व दर्शन नहीं किए जाते तब तक व्यक्ति को स्नान का लाभ प्राप्त नहीं होता। यह वृक्ष मुगल सम्राट अकबर के किले के अंदर बने पातालपुरी मंदिर में स्थित है। कहा जाता है की यह अक्षय वट वृक्ष मंदिर का सबसे पुराना मंदिर है। हिंदू धर्म के अलावा अक्षय वट का संबंध जैन और बौद्ध धर्म में भी माना जाता है। क्योंकि बुद्ध धर्म के अनुसार भगवान बुद्ध ने कैलाश पर्वत के निकट प्रयाग के इसी अक्षय वट का एक बीज बोया था। वहीं जैन धर्म की मान्यताओं के अऩुसार उनके तीर्थंकर ऋषभदेव ने अक्षय वट के नीचे तपस्या की थी। इसलिए इस स्थान व वृक्ष का बहुत महत्व माना जाता है।

कुंभ में स्नान के बाद  जरूर करें इस वृक्ष के दर्शन, वरना नहीं मिलेगा पुण्य

किंवदंती है कि भगवान राम और सीता ने वन जाते समय इस वट वृक्ष के नीचे तीन रात तक निवास किया था। अकबर के किले के अंदर स्थित पातालपुरी मंदिर में अक्षय वट के अलावा 43 देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं। मुगलों ने एक बार इस वृक्ष को जला दिया था, क्योंकि लोग इस वृक्ष की पूजा करने किले में आने लगे थे, जो मुगलों को पसंद नहीं था। इस किले में एक सरस्वती कूप बना हुआ है, जिसके लिए कहा जाता है की सरस्वती नदी यही से जाकर गंगा और यमुना से मिलती थी। वृक्ष के पास ही एक तालाब भी था जिसमें लोग मोक्ष प्राप्ति के लिए यहां वृक्ष पर चढ़कर तालाब में छलांग लगा देते थे। फिलहाल यह जगह बंद कर दी गई है। कहा जाता है कि मान्यता है कि इस वृक्ष के नीचे जो भी इच्छा व्यक्त की जाती थी वो पूरी होती थी।

एक अन्य मान्यता के अऩुसार
पौराणिक कथाओं के अनुसार जब एक ऋषि ने भगवान नारायण से ईश्वरीय शक्ति दिखाने के लिए कहा था। तब ऋषि ने कुछ देर के लिए पूरे संसार को जलमग्न कर दिया थ, हालांकि थोड़ी देर बाद ही उन्होंने पानी को गायब भी कर दिया था। लेकिन इस दौरान सभी चीज़ें पानी में समा गई थी, सिर्फ वट वृक्ष का ऊपरी भाग दिखाई दे रहा था। इसलिए इस वृक्ष का बहुत महत्व माना जाता है। कहा जाता है की प्रयाग में स्नान करने के बाद इस वृक्ष के दर्शन जरुर करना चाहिए। वरना पूण्यफल की प्राप्ति नहीं होती है।