क्या आप जानते है? इस दिन क्यों पूजा जाता है शिव जी का त्रिपुरारी रुप

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कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा कहा जाता है। कार्तिक पूर्णिमा को अन्य दो नाम त्रिपुरी पूर्णिमा और गंगा स्नान भी कहा जाता है। इस दिन स्नान, दान के साथ-साथ दीपदान का भी विशेष महत्व होता है।  पूर्णिमा के दिन स्नान, व्रत और तप करने से मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होता है। इसका महत्व सिख धर्म के लिए भी बहुत ज्यादा मना जाता है।

जानिए इस दिन क्यों पूजा जाता है शिव जी का त्रिपुरारी रुप

पूर्णिमा की रात को चंद्रमा का उदय हो रहा होता है उस समयकाल में शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छह कृतिकाओं का पूजन करना चाहिए। इससे शिव जी प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं। मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है की इस दिन कृतिका में शिवशंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है।

शिव भक्तों के अनुसार यह दिन इसलिए है खास

शिव भक्त कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इसी दिन भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का संहार कर दिया जिससे वह त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए। इससे देवगण बहुत प्रसन्न हुए और भगवान विष्णु ने शिव जी को त्रिपुरारी नाम दिया था इसलिए इस दिन शिव जी के त्रिपुरारी रुप की पूजा की जाती है।

सिख धर्म के लिए इसलिए

कार्तिक पूर्णिमा का दिन सिख धर्म के लिए भी महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इस दिन को वे प्रकाशोत्सव के रूप में मनाते हैं। इश दिन सिख संप्रदाय के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था। प्रकाशोत्सव के दिन सिख संप्रदाय के अऩुयायी बह स्नान कर गुरुद्वारों में जाकर गुरुवाणी सुनते हैं और नानक जी के बताए रास्ते पर चलने की सौगंध लेते हैं। इसके अलावा इस पर्व को गुरु पर्व से भी जाना जाता है। इस तरह यह दिन एक नहीं बल्कि कई वजहों से खास है।

विष्णु भक्तों के लिए इसलिए खास है यह दिन

विष्णु के भक्तों के लिए यह दिन इसलिए खास है क्योंकि भगवान विष्णु का पहला अवतार इसी दिन हुआ था। प्रथम अवतार में भगवान विष्णु मत्स्य यानी मछली के रूप में थे। भगवान को यह अवतार वेदों की रक्षा, प्रलय के अंत तक सप्तऋषियों, अनाजों एवं राजा सत्यव्रत की रक्षा के लिए लेना पड़ा था। इससे सृष्टि का निर्माण कार्य फिर से आसान हुआ। इस दिन गंगा-स्नान, दीप दान, अन्य दानों आदि का विशेष महत्व है। इस दिन क्षीरसागर दान का अनंत महत्व है, क्षीरसागर का दान 24 अंगुल के बर्तन में दूध भरकर उसमें स्वर्ण या रजत की मछली छोड़कर किया जाता है।