पिछले करीब 550 सालों से इस गांव में तपस्या कर रहे हैं ये संत, आज भी बढ़ रहे हैं बाल और नाखून

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लाइव हिंदी खबर :- गांव के बुजुर्गो का इस ममी के बारे में कहना है कि 15वीं शताब्दी में यहां गांव में एक संत तपस्या कर रहे थे। ये उन्हीं की ममी है। पौराणिक कथाओं में हमने अकसर ये सूना है कि ऋषि-मुनी किसी देवता को प्रसन्न करने के लिए सैकड़ों सालों तक तपस्या करते थे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवता उन्हें वरदान भी प्रदान करते थे। ऐसा हमने केवल सूना है।

550 सालों से इस गांव में तपस्या कर रहे हैं ये संत, आज भी बढ़ रहे हैं बाल और नाखून

लेकिन अब ऐसे ही एक सन्त को देखने की बारी आ गई है जो एक या दो नहीं बल्कि करीब 550 साल से ध्यान मग्न है। जी, हां तिब्बत से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर लाहुल स्पिती के गीयू नामक गांव में एक सन्त की ममी पाई गई है।हैरान कर देने वाली बात ये है कि इनके बाल और नाखून आज भी बढ़ रहे हैं। इसीलिए विशेषज्ञ इन्हें ममी मानने से कतरा रहे हैं।

यहां गांववालों का ऐसा कहना है कि पहले ये ममी गांव में एक स्तूप में स्थापित थी। मलबे से निकालने के बाद इस ममी का गहन परीक्षण किया गया जिससे ये बात सामने आई कि ये ममी करीब 545 साल पुरानी है। विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि बिना किसी लेप के और जमीन में दबी रहने के बावजूद इसमें कोई खराबी नहीं आई है। गांव के बुजुर्गो का इस ममी के बारे में कहना है कि 15वीं शताब्दी में यहां गांव में एक संत तपस्या कर रहे थे।

उसी दौरान गांव में बिच्छुओं प्ररकोप हो गया।गांव को इस प्रकोप से बचाने के लिए ही संत ने ध्यान लगाना प्रारंभ किया।संत की समाधि लगते ही गांव में बिना बारिश के इंद्रधनुष निकला और गांव बिछुओं के प्रकोप से मुक्त हो गया। हालांकि कुछ लोगों का ऐसा कहना है कि ये जीवित ममी बौद्ध भिक्षु सांगला तेनजिंग की है।

तिब्बत से भारत आने के बाद इसी गांव में आकर ध्यान में बैठ गए और फिर उठे ही नहीं। इस ममी के बाल और नाखून ही नहीं बढ़ रहे हैं बल्कि गांववालों का ऐसा भी कहना है कि एकबार ममी के सिर पर कुदाल लगने की वजह से खून भी निकला। चोट के उस निशान को आज भी साफ देखा जा सकता है। इस ममी को गांववालों की धरोहर मानते हुए इसे इस गांव में ही पुन स्थापित कर दिया गया है। ममी को एक शीशे के केबिन में रखा गया है।