पौराणिक व्रत कथा के अनुसार, स्वर्ग में स्थान पाने के लिए करें कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी का व्रत,जरूर पढ़ें

157

कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी, देवोत्थान और प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन तुलसी विवाह किया जाता है और देवी लक्ष्मी और श्री विष्णु की पूजा की जाती है। देवउठनी एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति को स्वर्ग में स्थान मिलता है और व्यक्ति के सारे पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा पाठ करनी चाहिए और पूजा संपन्न होने के बाद एकादशी व्रत कथा भी पढ़नी चाहिए। आइए जानते हैं देवउठनी एकादशी की पौराणिक व्रत कथा….

पौराणिक व्रत कथा के अनुसार, स्वर्ग में स्थान पाने के लिए करें कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी का व्रत, पढ़ें

देवउठनी एकादशी पौराणिक कथा

पौराणिक व्रत कथा के अनुसार एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे। प्रजा तथा नौकर-चाकरों से लेकर पशुओं तक को एकादशी के दिन अन्न नहीं दिया जाता था। तभी एक दिन किसी दूसरे राज्य का एक व्यक्ति राजा के पास आया और खुद को उनके राज्य में नौकरी पर रखने के लिए बोला। उसके बाद राजा ने उस व्यक्ति के सामने एक शर्त रखी जिसके मुताबिक उन्होंने कहा- रोज तो तुम्हें खाने को सब कुछ मिलेगा, पर एकादशी के दिन तुम्हें अन्न नही दिया जएगा। उस व्यक्ति ने उस समय राज की बात मान ली, पर एकादशी के दिन जब उसे फलाहार का सामान दिया गया तो वह राजा के सामने जाकर गिड़गिड़ाने लगा और बोला महाराज इससे मेरा पेट नहीं भरेगा। मैं भूखा मर जाऊंगा। मुझे अन्न दे दो। राजा ने उसे शर्त की बात याद दिलाई उसके बाद भी वह नहीं माना। इसके बाद राजा ने उसे आटा-दाल-चावल आदि दिए। वह हर दिन की तरह नदी पर गया वहां स्नान कर भोजन पकाया और भघवान का आवह्न किया, भगवान विष्णु वहां प्रकट हुए और प्रेम से उसके साथ भोजन करने लगे। भोजनादि करके भगवान वहां से अंतर्धान हो गए, और व्यक्ति अपने काम पर निकल गया।

पंद्रह दिन बाद अगली एकादशी को वह राजा से कहने लगा कि महाराज, मुझे दुगुना सामान दीजिए। उस दिन तो मैं भूखा ही रह गया। राजा ने कारण पूछा तो उसने बताया कि हमारे साथ भगवान भी खाते हैं। इसीलिए हम दोनों के लिए ये सामान पूरा नहीं होता। यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह बोला- मैं नहीं मान सकता कि भगवान तुम्हारे साथ खाते हैं। मैं तो इतना व्रत रखता हूं, पूजा करता हूं, पर भगवान ने मुझे कभी दर्शन नहीं दिए। राजा की बात सुनकर वह बोला- महाराज! यदि विश्वास न हो तो साथ चलकर देख लें। राजा एक पेड़ के पीछे छिपकर बैठ गया। उस व्यक्ति ने भोजन बनाया तथा भगवान को शाम तक पुकारता रहा, परंतु भगवान न आए। अंत में उसने कहा- हे भगवान! यदि आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग दूंगा।

लेकिन भगवान नहीं आए, तब वह प्राण त्यागने के उद्देश्य से नदी की तरफ बढ़ा। प्राण त्यागने का उसका दृढ़ इरादा जान शीघ्र ही भगवान ने प्रकट होकर उसे रोक लिया और साथ बैठकर भोजन करने लगे। खा-पीकर वे उसे अपने विमान में बिठाकर अपने धाम ले गए। यह देख राजा ने सोचा कि व्रत-उपवास से तब तक कोई फायदा नहीं होता, जब तक मन शुद्ध न हो। इससे राजा को ज्ञान मिला। वह भी मन से व्रत-उपवास करने लगा और अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुआ। इसलिए सच्चे मन से एकादशी का व्रत करने से व्रती को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।