संतान प्रप्ति के लिए इस विधि से करें पूजा, व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं होती है पूर्ण

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आंवला नवमी हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है। इस बार को 17 नवंबर को मनाई जाएगी। संतान प्राप्ति के लिए इस दिन व्रत किया जाता है, इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा करने से सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि इस दिन से द्वापर युग की शुरुआत हुई थी। इसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है, जो कि इस साल पूरे उत्तर व मध्य भारत में इस नवमी का खास महत्व है। यह व्रत पूरे विधि-विधान की जाए तो व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। आइए जानते हैं आंवला नवमी पूजा विधि….

आंवला नवमी पर संतान प्रप्ति के लिए इस विधि से करें पूजा, जानें शुभ मुहूर्त

इस विधि से करें पूजा

अक्षय नवमी के दिन सुबह सवेरे स्नान करके आवंले के पेड़ के आसपास का क्षेत्र साफ कर पेड़ के तने को साफ जल चढ़ाएं। स्नान कराने के बाद पेड़ पर कच्चा दूध, हल्दी, रौली लगाएं। इसके बाद आंवले के पेड़ की जड़ों में कच्चा दूध डालें। आंवले के पेड़ के तने में कच्चा सूत या मौली बांधते हुए 8 या 108 परिक्रमा करते हुए पेड़ पर लपेट दें। इसके बाद परिवार और संतान के सुख-समृद्धि की कामना कर वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन करें।

आंवला नवमी व्रत कथा

काशी नगर में एक निःसंतान धर्मात्मा वैश्य रहता था। एक दिन वैश्य की पत्नी से एक पड़ोसन बोली यदि तुम किसी पराए लड़के की बलि भैरव के नाम से चढ़ा दो तो तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा। यह बात जब वैश्य को पता चली तो उसने अस्वीकार कर दिया। परंतु उसकी पत्नी मौके की तलाश में लगी रही। एक दिन एक कन्या को उसने कुएं में गिराकर भैरो देवता के नाम पर बलि दे दी, इस हत्या का परिणाम विपरीत हुआ। लाभ की जगह उसके पूरे बदन में कोढ़ हो गया तथा लड़की की प्रेतात्मा उसे सताने लगी। वैश्य के पूछने पर उसकी पत्नी ने सारी बात बता दी।

इस पर वैश्य कहने लगा गौवध, ब्राह्यण वध तथा बाल वध करने वाले के लिए इस संसार में कहीं जगह नहीं है। इसलिए तू गंगा तट पर जाकर भगवान का भजन कर तथा गंगा में स्नान कर तभी तू इस कष्ट से छुटकारा पा सकती है। वैश्य की पत्नी पश्चाताप करने लगी और रोग मुक्त होने के लिए मां गंगा की शरण में गई। तब गंगा ने उसे कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवला के वृक्ष की पूजा कर आंवले का सेवन करने की सलाह दी थी। जिस पर महिला ने गंगा माता के बताए अनुसार इस तिथि को आंवला वृक्ष का पूजन कर आंवला ग्रहण किया था और वह रोगमुक्त हो गई थी। इस व्रत व पूजन के प्रभाव से कुछ दिनों बाद उसे संतान की प्राप्ति हुई। तभी से हिंदुओं में इस व्रत को करने का प्रचलन बढ़ा। तब से लेकर आज तक यह परंपरा चली आ रही है।