समस्त पापों व कष्टों से मिलेगी मुक्ति,आने वाली पापमोचनी एकादशी के दिन पढ़ें ये कथा

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शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत करने से व्यक्ति अपने समस्त पापों से मुक्ति पा सकता है। हिंदू कलेंडर के अनुसार चैत्र मास में आने वाली एकादशी को पापमोचिनी एकादशी कहते है। एकादशी हर महीने में दो बार आती है, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में दोनों पक्षों में एकादशी व्रत किया जाता है और दोनों का ही फल एक जैसा होता है। इस दिन व्रत और विधि-विधान से पूजा पाठ करने से मनुष्य को विष्णु पद प्राप्त होता है। यह व्रत सच्चे मन से किया जाए तो जातक सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति पाता है और मनुष्‍य को मोक्ष प्राप्ति मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

समस्त पापों व कष्टों से मिलेगी मुक्ति, पापमोचनी एकादशी के दिन पढ़ें ये व्रत कथा,

पापमोचनी एकादशी की कथा

राजा मान्धाता ने एक समय में लोमश ऋषि से जब पूछा कि प्रभु यह बताएं कि मनुष्य जो जाने अनजाने पाप कर्म करता है उससे कैसे मुक्त हो सकता है। राजा मान्धाता के इस प्रश्न के जवाब में लोमश ऋषि ने राजा को एक कहानी सुनाई कि चैत्ररथ नामक सुन्दर वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि तपस्या में लीन थे। इस वन में एक दिन मंजुघोषा नामक अप्सरा की नज़र ऋषि पर पड़ी तो वह उन पर मोहित हो गयी और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने हेतु यत्न करने लगी। कामदेव भी उस समय उधर से गुजर रहे थे कि उनकी नज़र अप्सरा पर गयी और वह उसकी मनोभावना को समझते हुए उसकी सहायता करने लगे। अप्सरा अपने यत्न में सफल हुई और ऋषि कामपीड़ित हो गए।

काम के वश में होकर ऋषि शिव की तपस्या का व्रत भूल गये और अप्सरा के साथ रमण करने लगे। कई वर्षों के बाद जब उनकी चेतना जागी तो उन्हें एहसास हुआ कि वह शिव की तपस्या से विरत हो चुके हैं. उन्हें उस अप्सरा पर बहुत क्रोध हुआ और तपस्या भंग करने का दोषी जानकर ऋषि ने अप्सरा को पिशाचनी होने का श्राप दे दिया। श्राप से दुखी होकर वह ऋषि के पैरों पर गिर पड़ी और श्राप से मुक्ति के लिए अनुनय करने लगी।

अप्सरा की याचना से द्रवित हो मेधावी ऋषि ने उसे विधि सहित चैत्र कृष्ण एकादशी का व्रत करने के लिए कहा भोग में निमग्न रहने के कारण ऋषि का तेज भी लोप हो गया था। इसलिए ऋषि ने भी इस एकादशी का व्रत किया जिससे उनका पाप नष्ट हो गया। उधर अप्सरा भी इस व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्त हो गयी और उसे सुन्दर रूप प्राप्त हुआ व स्वर्ग के लिए प्रस्थान कर गयी।

ऐसे करें एकदशी व्रत पूजन एवं उद्यापन

शास्त्रों में कहा गया है कि एकादशी का उपवास 80 वर्ष की आयु होने तक करते रहना चाहिए। किंतु असमर्थ व्यक्ति को उद्यापन कर देना चाहिए जिसमें सर्वतोभद्र मंडल पर सुवर्णादि का कलश स्थापन करके उस पर भगवान की स्वर्णमयी मूर्ति का शास्त्रोक्त विधि से पूजन करें। घी, तिल, खीर और मेवा आदि से हवन करें।

दूसरे दिन यानी द्वादशी के दिन सुबह स्नान करने के बाद गो दान, अन्न दान, शय्या दान, भूयसी आदि देकर और ब्राह्मण को भोजन कराएं स्वयं भोजन करें। ब्राह्मण भोजन के लिए 26 द्विजदंपतियों को सात्विक पदार्थों का भोजन कर सुपूजित और वस्त्रादि से भूषित 26 कलश दें।