लाइव हिंदी खबर :- चीन और ईरान के बीच संबंध लंबे समय तक संतुलित और रणनीतिक रहे हैं। चीन ने सीधे हथियार बेचने के बजाय ऐसे तरीके अपनाए जिससे अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन किए बिना ईरान की मदद कर सके| हाल के वर्षों में यह मुद्दा फिर चर्चा में खासकर जब अमेरिका ने इस पर चिंता जताई है। चीन ने अपनी रणनीति बदलते हुए ईरान को सीधे हथियार देने के बजाय ड्यूल यूज तकनीक और सामान देना शुरू किया।

यह ऐसे उपकरण होते हैं जिनका इस्तेमाल सामान्य उद्योगों में भी होता है और सैनिक उद्देश्य के लिए भी किया जा सकता है। इस तरह चीन खुले तौर पर हथियार बेचने से बचता रहा, लेकिन ईरान की रक्षा क्षमता को मजबूत करने में सहयोग देता रहा। 1980 के दशक में चीन ने ईरान को खुले तौर पर हथियार बेचे थे। खासकर ईरान इराक युद्ध के दौरान, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दवाव और प्रतिबंधों के बाद उसने अपनी नीति बदल दी।
1990 के बाद चीन ने ईरान को मिसाइल तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में मदद की जिससे ईरान धीरे-धीरे अपने हथियार खुद बनाने में सक्षम हो गया। 2006 में संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के बाद चीन ने अपनी सहायता को और गुप्त बना लिया। आरोप है कि कुछ चीनी और हांगकांग की कंपनियां अन्य कम्पनियों के जरिए ईरान तक जरूरी पार्ट्स और केमिकल पहुंचाती हैं।
इन सामानों में ड्रोन पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और रॉकेट फ्यूल बनाने वाले केमिकल शामिल होते हैं जिन्हें पकड़ना आसान नहीं होता। हाल के वर्षों में यह भी सामने आया है कि ईरान चीन के सैटलाइट नेवीगेशन सिस्टम का उपयोग कर सकता है। यह सिस्टम हथियारों की सटीकता बढ़ाने में मदद कर सकता है। इससे ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता पहले से ज्यादा प्रभावित हो सकती है, जो अमेरिका और अन्य देशों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।